उपचार पद्धति

अगर आप में प्रजननदोष है तो इसका मतलब यह नहीं की आप अपना परिवार नहीं स्थापित कर सकते | आज के ज़माने में इसके इलाज के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं | उनके कारण गर्भावस्था प्राप्ति की गुंजाईश अवश्य होती है | 

अधिक जानकारी के लिए आगे पढ़े …

फर्टिलिटी का मूल्यांकन (फर्टिलिटी ईवाल्यूएशन)

मेडिकल हिस्टरी का पुनरावलोकन करना पहिला कदम होना चाहिए | उस के बाद सम्पूर्ण शारीरिक जाँच और फर्टिलिटी टेस्ट्स होने चाहिए | कई सामान्य टेस्ट सर्व जोड़ों के लिए अनिवार्य होते हैं | उन के बाद हर जोड़े के निदान के अनुसार विशिष्ट टेस्ट प्रिस्क्राइब किये जाते है | 
Accordion Content

सामान्य लैबोरेटरी में किये गए टेस्ट अगर वर्त्तमान और संगत हो तो स्वीकारे जाते हैं | सभी ब्लड टेस्ट्स के लिए एक बार ही खून लेना काफी होता है | निम्न टेबल लगभग सभी प्रकारकी जाँच क्रियाएँ सूचीबद्ध करता है | इन सामान्य जाँच के बाद आपके फर्टिलिटी डॉक्टर विशेष जाँच के बारे में सूचना देंगे | 

सामान्य टेस्ट्स जो आम तौर पर सभी जोड़ों को करवाने होते हैं |

Name of Test

For woman

For husband

Obtained By

Blood group

Yes

Yes

Blood test

CBC

Yes

Yes

Blood test

Rubella IgG

Yes

Yes

Blood test

HIV/HBsAg/HCV

Yes

Yes

Blood test

TSH

Yes

No (sometimes)

Blood test

Prolactin

Yes

No (sometimes)

Blood test

Vitamin D

Yes

No

Blood test

Pap Smear

Yes

No

Office Visit

विशिष्ट टेस्ट्स जो सूचित हो या ना भी हो सकते हैं |

Name of Test

For woman?

For husband?

Obtained By

AMH

Yes

No

Blood test

FSH/LH

Yes

No

Blood test

Hysterosalpingogram

Yes

No

Office Visit

Hysteroscopy

Yes

No

Radiology

Transvaginal ultrasound/ Sonohysterogram

Yes

No

Office Visit

Semen Analysis

No

Yes

Office Visit

Genetic Testing

Yes

Yes

Blood test

Karyotype

Yes

Yes

Office Visit

Routine tests for fitness

(Creatinine, SGPT, RBS)

Yes

No (sometimes)

Blood test

FSH/LH/Testosterone

No

Yes

Blood test

यू ट्यूब पे देखिए – https://www.youtube.com/watch?v=6mH1z4tzMYo

Accordion Content

सामान्य लैबोरेटरी में किये गए टेस्ट अगर वर्त्तमान और संगत हो तो स्वीकारे जाते हैं | सभी ब्लड टेस्ट्स के लिए एक बार ही खून लेना काफी होता है | निम्न टेबल लगभग सभी प्रकारकी जाँच क्रियाएँ सूचीबद्ध करता है | इन सामान्य जाँच के बाद आपके फर्टिलिटी डॉक्टर विशेष जाँच के बारे में सूचना देंगे | 

सामान्य टेस्ट्स जो आम तौर पर सभी जोड़ों को करवाने होते हैं |

विशिष्ट टेस्ट्स जो सूचित हो या ना भी हो सकते हैं |

यू ट्यूब पे देखिए – https://www.youtube.com/watch?v=6mH1z4tzMYo

ओव्यूलेशन इंडकशन

फर्टिलिटी का इलाज का माने केवल आयव्हीएफ (IVF) नहीं | हर एक जोड़े को आयव्हीएफ की जरुरत नहीं होती | कई महिलाओं को थोडीही सहायता मिलने के बाद गर्भधारण हो सकता है | कई मामलों में ओव्यूलेशन प्रेरण (ओव्यूलेशन इंडकशन) और समयोचित यौन सम्बन्ध की सलाह काफी होती है |

Accordion Content

औसत 25% पेशंट्स के लिए फर्टिलिटी समस्या का प्रमुख कारण डिंबक्षरण दोष (ओव्युलेटरी प्रॉब्लम) यही होता है | कई महिलाओं  में डिंबक्षरण होता ही नहीं है या क्वचित होता है | कुछ मामलों में महिला सामान्यरूप से डिंबक्षरणक्षम होती है या उन का डिंबक्षरण नार्मल दिखाई देता है और उस के बावजूद गर्भधारण नहीं होता | उचित केस में ओव्यूलेशन प्रेरण फलदाई हो सकता है | गर्भधारण इलाज का यह सब से सुरक्षित एवं सरल विकल्प है | अगर किसी कपल की जाँच में कोई गंभीर समस्या न दिखाई दें तो समयोचित यौन सम्बन्ध के साथ ओव्यूलेशन इंडकशन की सलाह यह पहला कदम होता है |   

ओव्यूलेशन प्रेरण (ओव्यूलेशन इंडकशन) का मतलब क्या है?

दवाइयों की मदद से स्त्री बीजाण्ड का निर्माण प्रेरित करना इसे ओव्यूलेशन इंडकशन कहते है | इस प्रणाली के दौरान फॉलिकल के उत्सर्जन पर नजर रखी जाती हैं, समयोचित यौन सम्बन्ध या  IUI की सलाह दी जाती है |    

ओव्यूलेशन इन्डक्शन के लिए कौनसी दवाई दी जाती हैं और कार्यपद्धति क्या होती है?                         

आम तौर पे क्लोमीफीन और लेटरोझौल इन खाने की दवाइओं का इस्तेमाल होता है | जिन महिलाओं को इन दवाइओं का असर प्राप्त नहीं होता उन्हें गोनाडोट्रोपिन इंजेक्शन की सलाह दी जाती है |  सामान्यतः माहवारी के दूसरे या तीसरे दिन ओव्यूलेशन इन्डक्शन प्रणाली का चक्र शुरू होता है | अक्सर यह प्रक्रिया फॉलिक्युलर जाँच से (क्रमित अल्ट्रा सोनोग्राफी) जुडी हुई होती है | फॉलिकल विकास के निरिक्षण के लिए यह  सोनग्राफी का अनुक्रम आवश्यक होता है | फॉलिकल का विकसन उचित दिखाई देनेपर यौन सम्बन्ध की सलाह दी जाती हैं या उचित समय पर HCG का इंजेक्शन देकर IUI प्लान किया जाता है |                                                                        

ओव्यूलेशन इन्डक्शन के लिए दी जानेवाली दवाइयों से कोई जोखिम पैदा हो सकती है क्या? 

सबसे सामान्य जोखिम गुणित गर्भधारण की होती है | क्लोमीफीन और लेट्रोजोल के प्रयोग करनेपर जुड़वे गर्भधारण की संभावना हर चक्र में 5-8% होती हैं |  तिहरा या उस से ज्यादा गर्भधारण होने की संभाव्यता 1% से कम रहती है | अंडाशय में सिस्ट आने की सम्भावना रहती है जो की शायद ही कभी दर्दनाक हो सकती है | 

ओव्यूलेशन इन्डक्शन कितना सफल हो पाता है? 

सफलता का अनुपात महिला की उम्र और उसके फर्टिलिटी निदान के ऊपर निर्भर होता है | सामान्यतः हर ट्रीटमेंट सायकल में 15-20% सफलता प्राप्त होती है | 

फर्टिलटी विंडो के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखिए: https://www.youtube.com/watch?v=XN005L_Yswo&t=23s

इंट्रायुटेरिन इनसेमिनेशन-(आययुआय-IUI)

इंट्रायुटेरिन इनसेमिनेशन सहायक प्रजनन तकनिकी (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी- ART) में आम तौर पे सर्वाधिक प्रयोग होता हैं | इस प्रक्रिया के अंदर गर्भाशयग्रीवा से गर्भाशय के अंदर प्रक्षालित शुक्राणुओं (washed sperms) को छोड़ा जाता हैं | ऐसा करने से गर्भाशय के मुख्यद्वार को नजरअंदाज करते हुए शुक्राणु सीधे गर्भाशय के डिंबनालिकाओं के नजदीकी हिस्से में प्रविष्ट होते हैं | यह काम स्त्रीबीज उत्सर्जन के अवसर में किया जाता है तांकि शुक्राणु अंडे तक आसानीसे पहुँच सके और गर्भधारण मुमकिन हो | 

Accordion Content

IUI करना कब मुनासिब रहता है? 

पुरुष इनफर्टिलिटी- जब पुरुष की शुक्राणु गिनती और फुर्तीलापन कम हो या पुरुष को वीर्यक्षेपण में कठिनाई हो तब IUI तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है | 

स्त्री इनफर्टिलिटी- जिन महिलाओं का बीजक्षरण अनित्य हो उन्हें ओव्यूलेशन प्रेरण (ओव्यूलेशन इंडकशन) के साथ साथ IUI की सलाह दी जाती है | एंडोमेट्रिओसिस होने पर यह एक प्रारंभिक उपाय समझा जाता है | जिन महिलाओं के गर्भाशय के मुख्यद्वार पर शल्य की वजह से या कोई अन्य कारणवश जख्म हो तो उन्हें भी IUI मुनासिब रहता है |                      

शुक्राणु दानसहित IUI (डोनर स्पर्म) की कब जरुरत पड़ती है?

अगर पति की शुक्राणु गिनती शुन्य हो, या सीमेन टेस्ट पर गंभीर असामान्यताएं दिखाई दे और उस जोड़े को ICSI cycle का खर्च जुटाना मुमकिन ना हो तो डोनर आययुआय विकल्प मायने रखता है | अगर पुरुष के परिवार की तरफ से कोई अनुवांशिक समस्या हो तब भी शुक्राणुदान के साथ IUI विकल्प सोचा जा सकता है |                                      

शुक्राणु की प्राप्ति कैसे की जाती है? 

पति को मास्टरबेशन कर के एक निर्जन्तुक पात्र में वीर्य उत्सर्जित करने को कहा जाता है | निर्जन्तुक पात्र का प्रावधान क्लिनिक करता है | वीर्यप्राप्ति के 3-5 दिन पहले यौन सम्बन्ध से परहेज रहने को कहा जाता है |  

IUI की प्रक्रिया कैसे की जाती है? 

IUI की प्रक्रिया स्वाभाविक ऋतुचक्र के दौरान या ओव्यूलेशन इन्डक्शन प्रक्रिया के दौरान की जाती है | आम तौर पे माहवारी के २ या ३ दिन बाद IUI की प्रक्रिया शुरू होती हैं | बीजाण्ड-कोष (फॉलिकल) का विकसन नियमित अंतराल के बाद अल्ट्रासोनोग्राफी के द्वारा नापा जाता है | बीजाण्ड-कोष का विकसन पर्याप्त स्तर पर पहुँचने के बाद एक उत्प्रेरक इंजेक्शन दिया जाता है | बीजाण्ड उत्सर्जन के मौके पर IUI किया जाता है | वीर्य का नमूना लैब में प्रक्षालित किया जाता है | लैब प्रोसेस के दौरान द्राव अलग हो कर शुक्राणु संकेंद्रित हो जाते हैं | इस सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरी करने में ४५ से ६० मिनट तक अवधी लगता है | प्रत्यक्ष शुक्राणुरोपण की प्रक्रिया चंद मिनटों में पूरी होती है |

IUI प्रक्रिया के फायदे क्या हैं? 

यह एक साधी-सरल, दर्दरहित और कम खर्च की प्रक्रिया है | यह एक सुरक्षित और आसान  विकल्प है जिसमें जोखिम कम तथा निगरानी भी कम लगती है |  

IUI प्रक्रिया के सफलता का अनुपात क्या है? 

सफलता का अनुपात कई कारकों पर निर्भर करता है | महिला की उम्र तथा फर्टिलिटी दवाइयोंका प्रयोग अनुरूप हो तो हर सायकल में १५ से २० % महिलाएँ इस प्रक्रिया से गर्भधारण कर सकती हैं | 

IUI प्रक्रिया के अंतर्गत जोखिम क्या हो सकती है?  

कुछ महिलाएँ थोड़ी असुविधा महसूस करती हैं | कुछ महिलाओं को सिकुड़न का दर्द होता है | कुछ मामलों में गर्भाशय ग्रीवा के मुखपर हलका घाव लगकर थोड़ा खून बह सकता हैं या धब्बा लगता है (स्पॉटिंग) |  IUI के साथ डिंबक्षरण की जो दवाइयाँ दी जाती है उन के अतिरिक्त असर के कारण ज्यादा क्षरण हो कर गुणित गर्भधारणा हो सकती है | IUI की वजह से दर असल जन्म-दोष पैदा होते हैं ऐसा नहीं | IUI प्रक्रिया के पश्चात् संसर्ग (infection) का छोटा खतरा होता है | 

IUI प्रक्रिया के बाद क्या सावधानी बरतनी चाहिए?  

बिस्तर पर लेटे रहने की, सफर न करनेकी या आहार पर नियंत्रण इन की कोई आवश्यकता नहीं रहती | प्रक्रिया के तुरंत बाद सामान्य जीवन-परिक्रम शुरू हो सकता है |

इन व्हिट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आयव्हीएफ - IVF) और इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आयसीएसआय - ICSI)

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ-IVF) के साथ महिला के अंडों को आईवीएफ प्रयोगशाला में शुक्राणु द्वारा निषेचित किया जाता है |  आईसीएसआई (ICSI) प्रक्रिया में IVF के आगे एक और कदम लिया जाता है | स्त्री के परिपक्व बीजाण्ड में (उसाईट  – oocyte में) एक शुक्राणु इंजेक्शन के द्वारा छोड़ा जाता हैं | इस क्रिया के लिए कांच की सुई लगाई हुई एक सुक्ष्म नलिका का (पिपेट का) इस्तेमाल किया जाता हैं | IVF और ICSI सबसे उन्नत, अत्याधुनिक प्रजनन तकनिक हैं | 

Accordion Content

IVF/ICSI प्रक्रिया में आम तौर पर निम्न लिखित कदम उठाए जाते हैं-

  • स्त्रीबीजनिर्मिति को बढ़ावा देने के लिए दवाइ  
  • अंडाशय में से तैयार स्त्रीबीजोंको निकाललेना| (ऊसाइट पिक अप- OPU)
  • आयवीएफ लैब में बीजाण्डों का निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) और संवर्धन
  • एक या दो भ्रूण का गर्भाशय में प्रत्यारोपण (एम्ब्रियो ट्रांसफर)
  • ल्युटियल स्थिति का इलाज (आम ऋतुचक्र में ओव्ह्युलेशन के बाद दूसरी माहवारी शुरू होने के पहले कुछ १४ दिन के अवस्था को ल्युटियल स्थिति कहा जाता है | IVF/ICSI प्रक्रिया के बाद ल्युटियल स्थिति को मैनेज करनेके लिए दवाई देना जरुरी होता है) 
 

IVF और ICSI प्रक्रियाओं में अंतर क्या है? 

दोनों प्रक्रियाओं में शुक्राणु बीजाण्ड को कैसे निषेचित करता हैं इस में अंतर है | IVF प्रक्रिया में लैब के नियंत्रित वातावरण में एक खास डिश में निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) के लिए बीजाण्ड और बहुत सारे शुक्राणु रखे जाते हैं | ICSI प्रक्रिया में पृथक किया हुआ केवल एक शुक्राणु इंजेक्शन द्वारा बीजाण्ड में प्रविष्ट किया जाता है | 

IVF/ICSI की सिफारिश कब की जाती है?                                                                   

पर्यायी विकल्प असफल रहें हों या वे सफल होने की उम्मीद कम हो तब IVF/ICSI की सिफारिश की जाती है | डिंबनालिका बाधित या अवरोधित हो तब IVF/ICSI सूचित होता है | शुक्राणु गिनती अल्प हो या इंट्रायुटेरिन इनसेमिनेशन असफल रहा हो तो IVF/ICSI का संकेत मिलता हैं | पिसीओएस त्रस्त महिला या जिन का IUI के साथ या IUI विरहित ओव्यूलेशन इन्डक्शन असफल रहा हो तब भी IVF/ICSI की सलाह दी जाती है | जिन्हे सौम्य या मध्यम एंडोमेट्रिओसिस की बाधा हो उन को IVF/ICS का प्रयोग करने के पहले IUI की सलाह दी जाती है | अगर एंडोमेट्रिओसिस तीव्र किसम का हो तो सीधे IVF/ ICSI उचित होता है |  कुछ जोड़े ऐसे होते हैं जिन के मामलों में इनफर्टिलिटी का सटीक निदान नहीं हो पाता और IUI असफल रहा हो तब IVF/ICSI का प्रयोग किया जा सकता है | इस के अलावा जहाँ बीजाण्ड का दान, एम्ब्रियो ट्रांसफर पूर्व अनिवांशिकी जाँच करवानी हो या सरोगसी अनिवार्य हो वहां IVF/ ICSI का प्रयोग उचित होता है | 

IVF/ ICSI महँगा पड़ता है क्या? 

IVF/ ICSI प्रक्रिया  करने के लिए प्रशिक्षित और कुशल व्यवसाइकों की तथा परिष्कृत लैबोरेटरी और साधन सामग्री तैनात होना जरुरी होता हैं | IVF/ ICSI प्रक्रिया का कुल खर्चा काफी हद तक दवाइयों (गोनाडोट्रोपिन इंजेक्शन) पर निर्भर करता है जो खुदबखुद महिला की उम्र और एग रिज़र्व के ऊपर निर्भर करता है | 

क्या IVF/ ICSI प्रक्रिया के माध्यम से जन्मे हुए बच्चों में पैदाइशी दोष ज्यादा दिखाई देते हैं? 

IVF/ ICSI प्रक्रिया के माध्यम से जन्मे हुए बच्चों में पैदाइशी दोष पाने का प्रमाण स्थूल रूप से आम आबादी में जितना होता है उतनाही रहता हैं | जहाँ गर्भधारण के कठिनाई के लिए मूलतः पुरुष-अनुवांशिकता जिम्मेवार है वहां IVF/ ICSI प्रक्रिया के माध्यम से जन्मे हुए लड़कों में पैदाइशी फर्टिलिटी दोष दोहराए जाने की संभावना रहती हैं |   

IVF/ ICSI प्रक्रिया अपनाने से महिला को कोई स्वास्थ्य विषयक समस्या का सामना करना पड़ेगा? 

IVF/ ICSI प्रक्रिया के दौरान जो दवाइयाँ दी जाती हैं उन के कुछ दुष्परिणाम संभव होते हैं | छोटी क्यों न हो कुछ जोखिम लक्षणीय रूप से मौजूद होती हैं जैसे की गुणित गर्भधारण, एक्टोपिक प्रेगनेंसी, संक्रमण (infection) और आसपास के किसी अवयव को चोट पहुँचना । अंडाशय का नियंत्रित उत्तेजन कभी कभी अंडाशय की अतिउत्तेजित अवस्था (ओवेरियन  हाइपरस्टीम्यूलेशन सिंड्रोम- ओएचएसएस) निर्माण कर सकता है | इस अवस्था के लक्षण कम-अधिक परिमाण के होते हैं | पेट में मचलन, उलटी, अतिसार, पेट का तीव्र फुलन, तेज गतिसे वजन बढ़ना, साँस में घुटन आदि | ओएचएसएस के जोखिम का निवारण दवाइयों का मसविदा (protocol) ठीक संभालने से किया जा सकता है | गुणित गर्भधारण की जोखिम नियंत्रित करने के लिए प्रत्यारोपण केवल एक या दो भ्रूण तक सीमित किया जाता है | दो से ज्यादह भ्रूण प्रत्यारोपित नहीं करने चाहिए | प्रत्यारोपण के बाद अगर कोई भ्रूणउर्वरित रहें तो उनको बेहद कम तापमान में थमाया जा सकता हैं (एम्ब्र्यो फ्रीजिंग) ताकि वे लम्बे समयतक लगभग शत-प्रतिशत जीवित रह सकते हैं |

IVF/ ICSI प्रक्रिया में सफलता का अनुभव कैसा हैं? 

हमारा सफलता का अनुपात पुरे भारत में उत्तम सफलताओं में से एक अनुभवित है | बरसों का अनुभव्, विविध गतिविधियों का निरंतर पुनरमापन तथा पुनर्लेखन, हमारा लैबोरेटरी का चलन और व्यवस्थापन इन के परिणामतः हमारे सफलता का अनुपात बेहतर रहता हैं |

ब्लॉग पढ़िए- आयव्हीएफ इलाज पद्धति का सीधा सरल परिचय 

दानार्जित बीजाण्ड (डोनर एग आयव्हीएफ)

दानार्जित बीजाण्ड प्रक्रिया यह IVF/ICSI प्रक्रिया ही हैं, लेकिन, यहाँ खुद के नहीं तो किसी और स्त्री के दिए हुए स्त्रीबीज इस्तेमाल किये जाते है | डोनर एग्स का संकर पेशेंट के पति के शुक्राणु से या दानार्जित शुक्राणु से किया जा सकता है | जब दोनों ही दानार्जित हो तो उसे एम्ब्र्यो अडोपशन कहा जाता हैं |  

Accordion Content

डोनर एग्स की जरुरत किसे होती है?  

जिन महिलाओं को खुद के बीजाण्ड से गर्भधारण संभव ना हो वे डोनर एग्स का प्रयोग कर सकती हैं | यह संभव होने के लिए वह महिला खुद गर्भपालन सक्षम होनी चाहिए | महिला की उम्र बड़ी हो, उस का एग रिज़र्व अल्प हो या जिसे समयपूर्व बीजाण्डकोष की विफलता (प्रीमच्योर ओवेरियन फेलियर )प्राप्त है उसे डोनर एग आयव्हीएफ का विकल्प सूचित होता है |

बीजाण्ड का दान कौन करता है

ICMR (इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च) के दिशादर्शक नियमों के अनुसार बीजाण्ड का दान करनेवाली स्त्री अनाम होना अनिवार्य है | बीजाण्ड दात्री तथा बीजाण्ड की स्वीकृति करने वाली महिला दोनों की पहचान गोपनीय रहनी चाहिए | बीजाण्ड दात्री महिलाए २१ से २९ की आयु के बीच जवान और स्वस्थ होनी चाहिए | सामान्यतः उनका का खुद का, कि मान एक अपत्य होता है | उन की वैद्यकीय और मानसशास्त्रीय चिकित्सा की जाती है तथा वे एचआयव्ही या पीलिया (हेपटाइटिस) से बाधित नहीं हैं यह देखा जाता हैं | ICMR द्वारा सुनिश्चित की गयी सभी दिशादर्शक नियमों का पालन दृढ़ता के साथ किया जाता है | यह छानबीन के बाद ही बीजाण्ड दान के लिए महिला स्वीकृत होती है |  

बीजाण्ड-दान की प्रक्रिया प्रणाली क्या है

बीजाण्ड दात्री और बीजाण्ड-ग्राहक स्त्री दोनों का ऋतुचक्र गोलियों के इस्तेमाल से समक्रमित किया जाता है | माहवारी के बाद पहले या दूसरे दिन प्राप्तकर्ती की एस्ट्राडियोल गोलियों की ट्रीटमेंट शुरू होती है | इस से उस का गर्भाषयान्तर्गत त्वचावरण तैयार होने में मदद होती है | उसी समय दात्री का बीजाण्डक्षरण समक्रमित करने की प्रक्रिया शुरू होती है | दात्री के बीजाण्डकोष परिपक्व होने के बाद, जिसे १०-११ दिन लगते हैं, उस की बीजाण्ड निष्कर्षण क्रिया (ऊसाइट पिक अप) की जाती है | जिस दिन यह निष्कर्षण किया जाता है उसी दिन प्राप्तकर्ति के पति का वीर्य लिया जाता है | उस के बाद लैबोरेटरी में शुक्राणु और बीजाण्ड का निषेचन किया जाता है | दूसरी तरफ उसी वक्त प्राप्तकर्ति महिला की यथोचित दवाइयों के साथ ल्युटियल प्रबंधन की शुरुवात की जाती हैं | ३-५ दिन के बाद १ या २ भ्रूण बहुत सावधानी के साथ सोनोग्राफी के तहत प्राप्तकर्ति के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किये जाते है (एम्ब्रियो ट्रांसफर) | बचे हुए स्वस्थ भ्रूण सुनियत तरीकेसे अतिशीतपेटी (एम्ब्र्यो फ्रीजिंग) में जमाएँ जाते है |

बीजाण्ड-दान के क़ानूनी पहलू क्या हैं? 

ICMR के दिशादर्शक नियमों के अनुसार बीजाण्ड दान अनामी और गोपनीय हो तो अनुज्ञेय है | बीजाण्ड दात्री का उस के दिए हुए बीजाण्ड से प्राप्त संतति के ऊपर कोई हक़ नहीं बनता | इस मक्सद के अनुबंध पर (कॉन्ट्रैक्ट) उसे दस्तखत जोड़ने पड़ते है | 

(एग फ्रीजिंग - Egg freezing)

बढ़ती उम्र के साथ स्त्री की प्रजनन क्षमता कम होती जाती है | बीजाण्डों की गुणवत्ता और संख्या घटने के कारणवश ऐसा होता है | २० से ३० तक की उम्र में स्त्री सर्वाधिक प्रजननक्षम रहती है | ३० के बाद प्रजननक्षमता घटना शुरू हो जाता है और उत्तर ३५ के उम्र में घटाई तेजी से होती है |

एग फ्रीजिंग करने से कोई महिला अपने खुद के बीजाण्ड परिरक्षित करके खुद ही भविष्य में निषेचित करा सकती है |  बीजाण्डों को इस प्रकार परिरक्षित करके भविष्य में गर्भधारणा के काम में लाना यही इस प्रक्रिया का उद्देश्य रहता है |
Accordion Content

एग फ्रीजिंग किसके लिए उपयुक्त है?

  • जो माहिला एसएलई (SLE) जैसे बीमारी से त्रस्त हैं   
  • जिन्हे कैंसर की ट्रीटमेंट (जिस में रेडिएशन या कीमोथेरपी का अंतर्भाव हों ) शुरू करनी होती हैं उन की प्रजनन क्षमता उस वजह से बाधित हो सकती है | ऐसी ट्रीटमेंट शुरू करने के पहले अगर उन के बीजाण्ड परिरक्षित किये जाय तो ट्रीटमेंट के बाद ऐसी महिला संतति प्राप्ति की आशा रख सकती हैं  
  • सामाजिक कारण- युवावस्था के दौरान एग फ्रीजिंग करनेसे, आगे चलके, मातृत्व के लिए पूरी तरह से तैयार होने पर उन स्त्रीबीजों का उपयोग किया जा सकता है | इस सुविधा का इस्तेमाल करनेसे गृहस्थी और नातेदारी में स्थिरता आने तक गर्भधारण आगे ढकेला जा सकता है, आगे की शिक्षा और करियर संभाला जा सकता है |     

एग फ्रीजिंग कब करना चाहिए? 

आम तौर पे जवान उम्रमें एग फ्रीजिंग करना मुनासिब होता है | जवान महिला बीजाण्ड निर्मिति अधिक मात्रा में और गुणवत्ता में अधिक स्वस्थ तौर पर करती है | ऐसे बीजाण्ड गर्भाधरणा के लिए सुप्रवृत्त रहते हैं | सबसे अधिक मुनासिब आयु २७-३४ मानी जाती है | एग फ्रीजिंग इस के ऊपरी आयु में भी किया जा सकता है, लेकिन, दो या ज्यादा सायकल में करना अनिवार्य हो सकता है | 

बीजाण्ड स्वस्थ है या नहीं इस का अनुमान कैसे लगाया जाता है? 

महिला की उम्र स्वस्थता का पहला निर्देशक होता हैं | AMH ब्लड टेस्ट और AFC अल्ट्रासाउंड इन दो परीक्षणों से महिला का एग रिज़र्व अच्छी तरह से ज्ञात होता है |

इस प्रक्रिया के कार्यविधि क्या हैं? 

एग फ्रीजिंग के लिए पहला कदम IVF/ICSI के लिए बीजाण्ड निष्कर्षण करते हैं वही होता है | लेकिन दूसरे कदम में निष्कासित बीजाण्डों में से परिपक्व बीजाण्ड अलग करके उन्हें अतिशीतल अवस्था में जमाया जाता है | यह प्रक्रिया पूर्ण करनेके लिए माहवारी के दूसरे दिन से १२-१४ वे दिन तक समय लगता है |

महिला जब गर्भप्रत्यारोपण स्वीकारने के लिए तैयार होती है (जों की कई सालों बाद हो सकता है) तब अतिशीत बीजाण्डों को डी-फ्रीज कर महिला के पति के शुक्राणु से लैबोरेटरी में निषेचित किया जाता है | उस के ३-५ दिन बाद, निषेचित बीजाण्ड का महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपण किया जाता है |  

IVF/ ICSI के दौरान महिला के आरोग्य को क्या जोखिमें होती है?

IVF/ ICSI प्रक्रिया के दौरान जो दवाइयाँ दी जाती हैं उन की वजह से अंडाशय अति उत्तेजित हो सकता है | इस दुष्परिणाम को ओव्हेरियन हाइपरस्टिम्युलेशन सिंड्रोम (ओएचएसएस) कहते हैं | इस के कारण कम अधिक तीव्रता के लक्षण अनुभूत हो सकते हैं | जैसे की नॉशिया, वमन, डायरिया, पेट में फुलन, तेजी से वजन बढ़ना, साँस लेने में कठिनाई आदि| ओएचएसएस का खतरा सम्पूर्ण प्रणाली का मसविदा (प्रोटोकॉल) सुनियोजित ढंग से अपनाया गया हो तो काफी कम किया जा सकता है | शायद कभी कभी निष्कर्षण सुई की वजहसे खून बह सकता है, आंत, मूत्राशय या रक्तनलिका को क्षति हो सकती है |

शुक्राणु का शल्यक्रिया द्वारा निष्कर्षण (सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल)

सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल (एसएसआर – SSR) प्रक्रिया में वृषण या अधिवृषण से शल्यक्रिया द्वारा शुक्राणु का निष्कर्षण किया जाता हैं |

Accordion Content

एज़ूस्पर्मिया का मतलब वीर्य में शुक्राणु उपस्थित ना होना | शुक्राणु वाहक नलिका में अवरोध निर्माण होने से भी एज़ूस्पर्मिया का दोष उत्पन्न हो सकता है | जब अवरोध न होने के बावजूद यह दोष उपस्थित हो तब उसका कारण वृषणद्वयी में शुक्राणु निर्मिति का अभाव या अल्पनिर्मिति यह हो सकता है | 

अगर एज़ूस्पर्मिया का कारण शुक्राणु का अवरोध या अल्पनिर्मिति हो तो ऐसे मर्दों को अपनी जैविक संतति प्राप्त करने की गुंजाईश अवश्य होती है | ऐसे मामलों में गर्भधारण के लिए सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल के साथ साथ ICSI का भी अवलम्ब करना पड़ता है |   

आम तौर पे  सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल के तकनीक क्या होते हैं? 

PESA (परक्यूटेनीयस एपीडीडायमल स्पर्म एस्पिरेशन) – अधिवृषण में सुई डालकर शुक्राणु को खींचकर निकाला जाता है | इस क्रिया को २०-३० मिनट का अवधी लगता है | अगर यूरोलॉजिस्ट को द्रवमें कोई शुक्राणु दिखाई ना दे तो वह TESE नमक दूसरा विकल्प अपनाता है | 

TESE (टेस्टीक्यूलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन): इस प्रक्रिया में वृषण से एक या अनेक बॉयोप्सी के द्वारा ऊतक पेशी निकाली जाती है जिस में से शुक्राणु का निष्कर्षण किया जाता है | 

शुक्राणु प्राप्त हुए तो उन का आयसीएसआय में तुरंत प्रयोग किया जाता है | अन्यथा, भविष्य के लिए अतिशीतलीकरण (फ्रीजिंग) कर के उन को थमाया जाता है | 

अगर शुक्राणु प्राप्ति ना हो तब क्या किया जा सकता है? 

शुक्राणु उपस्थित ना रहने की संभावना रहती तो हैं | यह जोड़ों के लिए भावनात्मक रूप से दिल दहलानेवाला हो सकता हैं | इस लिए इस विकल्प का स्वीकार करने के पहले दोनों जोड़ीदारों ने इस संभाव्यता के बारे में सोचना चाहिए और फर्टिलिटी डॉक्टर के साथ इसके बारे में खुलकर बात करनी चाइए |